इक बार सांवरे के, दरबार आइये,
चरणों में सिर झुकाइये, मन की सुनाइए ।।
इक बार आके देखले, दरबार श्याम का,
सारे जहां में है नहीं, दातार श्याम सा,
भर भर के झोली दे रहा, झोली पसारिये,
चरणों में सिर झुकाइये, मन की सुनाइए ।।
लाखो की बिगड़ी बन रही, किस्मत सवर रही,
बदहाल ज़िन्दगी जो थी, खुशहाल हो रही,
विश्वास अगर नहीं हो, आ आजमाइए,
चरणों में सिर झुकाइये, मन की सुनाइए ।।
लेखक – पवन भाटिआ जी




