अकेली गई थी ब्रज में, कोई नही था मेरे संग में,
मोर पंख वाला मिल गया, बांसुरी वाला मिल गया ।।
नींद चुराई बंसी बजा के, चैन चुराया सैन चला के,
लगी आस मेरे मन में, गई थी मैं वृंदावन में,
बांसुरी वाला मिल गया, मोर पंख वाला मिल गया ।।
उसी ने बुलाया उसी ने रुलाया, ऐसा सलोना श्याम मेरे मन भाया,
टेडी बांकी चाल देखी, टेड़ा मुकट भी देखा,
टेढ़ी टांग वाला मिल गया, मोर पंख वाला मिल गया ।।
बांके बिहारी को में मन में बसाऊ, तेरे बिन श्याम में चैन नहीं पाउ,
लगन लगी तन और मन में, ढूंड रही मैं निधिवन में,
प्यारा गऊ वाला मिल गया, मोर पंख वाला मिल गया ।।
लेखक – रामगोपाल शास्त्री जी




