



कन्हैया आछी लागी रे थारी प्रीतडी,म्हारे मनडामें उठी रे हिलोर


नख पर धार लियो गिरिराज, नाम गिरधारी पायो है ॥

श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए ।कलितललितवनमाल जय जयदेव हरे ॥ १॥दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन

प्रीतम तू मोहे प्राणन तें प्यारो । तुम मेरे पुतरिन

अकेली गई थी ब्रज में, कोई नही था मेरे संग

