जाऊँ तोरे चरण कमल पर वारी,
हे गोपाल गोिवंद मुरारी,
शरणागत हूँ द्वार तिहारे ।।
कितना घना बना अँधियारा,
घुलता मैं सारा का सारा,
तू ही मेरा एक आधारा,
जाऊँ तोरे चरण कमल पर वारी ।।
सननन पवन झकोरा आता,
हारा मन तपता घबराता,
टूट रहा सांसो का तार,
जाऊँ तोरे चरण कमल पर वारी ।।
मोर पंख की किरण जगाकर,
अधरों पर मुस्कान उगाकर,
हर ले मन कì पीड़ अपार,
जाऊँ तोरे चरण कमल पर वारी ।।




