(दोहा: अपने हरि को हम दूंढ लीओ, जिन लाल अमोलक लाख मे,
हरि के अंग अंग मे नरमी है जितनी, नरमी नाही वैसी माखन मे,
छवि देखत ही मै तो झाकी रही, मेरो चित चुरा लीओ झांकन मे,
हियरा में बसो, जियरा में बसो, प्यारी-प्यारे बसो दऊ आखन में,
लाडली-लाल बसो, श्यामा-श्याम बसो दऊ आंखन में)
जय जय राधा रमण हरि बोल,
जय जय राधा रमण हरि बोल ।।
नव नागर नवल छल रसिया,
प्यारो कान्हा मेरो मन बसिया,
करीं कालिंदी फूल किलोल,
जय जय राधा रमण हरि बोल ।।
अखियन काजर, मृग छोना सो,
नख बेसर जादू टोना सो,
दऊ रस के भरें हैं कपोल,
जय जय राधा रमण हरि बोल ।।
ब्रज नाचे उसकी किलकन पे,
कजरीली तिरछी चितवन पे,
‘सुखदास’ बिका बिन मोल
जय जय राधा रमण हरि बोल ।।
लेखक – स्वामी सुखदेवाचार्य जी




