प्रगटी श्री राधा, रूप अगाधा, सब सुख साधा नावे,
मुनि प्रेम अगाधा में टन वाधा, लख रहीं सोटी लजावे ।
ब्रज घर घर, माई बटे बधाई, सब मिल मंगल गाई,
कीरत बढ़ भागी, अति सुख पागी, पुरजन करत बढ़ाई ।
सुर नर मुनि हर्षे, सुम नई बरसे, चढ़े विमाना आये,
भये चित्र से ठाड़े लख सुर बाड़े, बाजे विविध बजावे ।
नारद सनकादी, शिव ब्रह्मा आदी, भगू आदिक मुनि जेते,
इंद्रादिक जे जहां सुकर ते कहा, आए सजन सवेते ।
शिव मिलकर जोरे, करत निहोरे, जय जय भानु दुलारी,
जय कीर्ति कुमारी, जय हरि प्यारी, जय जय सुखदातारी ।
जय नित्य किशोरी, प्रिय चित चोरी, यह विनती सुन लीजे,
ब्रज वास ही दीजे, ब्रज रस पीवे, चरण शरण गह लीजे ।
कर जोर मनाऊं, यह वर पाऊं, दंपति यश नित गाऊं,
पद कमल सुतोरा, मधु मुष मोरा, मन नित जहां बसाऊं ।
एहि भांति सकल सुर, स्तुति करके, निश निश धाम सिधारे,
नंदा आदिक आए, अति हर्षाए, सब मिल कंठ लगाए ।
सब ही जन गावे, सब ही बजावे, सब ही दहिले भाजे,
बरसाने आए विदिन सहाए, जय जयकार करावे,
जय जयकार करावे ।
लेखक – श्री कुंभनदास जी




