नाम हरी का अनमोल है,
अमृत रस है भरा,
जितना भजोगे उतना बढ़ेगा,
रोम रोम में,
हरी से नेह लगा ले ।।
तर्ज – आओगे जब तुम ओ साजना ।
नर तन चोला पाया है,
क्यों ना हरी गुण गाया है,
गर्ब में कोल किया तूने,
जग में आके भुलाया है,
व्यर्थ ना हो, ये नर तन,
हरी नाम गाले, हरी गुण गाले
झूम झूम के
हरी से नेह लगा ले ।।
पल पल बीता जाए है,
माला ना तुझको सताए है,
अंतर मन के दर्पण में,
कुछ ना नज़र तुझे आये है,
देख ज़रा, सोच ज़रा,
खोया क्या पाया, हरी को भुलाया
घूम घूम के
हरी से नेह लगा ले ।।
लेखक – पवन भाटिआ जी




